May 05, 2020

#Ramayan: क्या राम ने वकाई खाये थे शबरी के झूठे बेर?

रामानंद सागर की रामायण में शबरी के राम मिलान वाला एपिसोड Youtube पे देख रहा था। रामानंद जी ने रामकथा बहुत साफ़, सहज, और दिल छू लेने वाले भाव से बनायी है, पर शबरी वाला एपिसोड थोड़ा थोड़ा आँखों में चुबता है।

शबरी कहती है "हे राम मुझे नीच कुल में उत्त्पन ये शरीर छोड़ने की आज्ञा देने से पहले मुझे भक्ति का ज्ञान प्रदान करो प्रभु।" उसके बाद राम शबरी को नवदा भक्ति के बारे में बताते है।

रामानंद की रामायण के मखमली क़ालीन जैसी लगती है। शबरी का बार बार खुद को 'नीच' कहने वाले संवाद इस मखमली क़ालीन पर टाट के पैबंद जैसे लगते है।

एक और बात मुझे वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस पढ़ के पता चली। न वाल्मीकि जी ने, न ही तुलसीदास जी ने शबरी के जूठे बेरो वाली बात कही नहीं लिखी है। राम शबरी के यहां जाकर बेर खाते हैं न कि जूठे बेर, जैसा रामानंद जी ने दिखाया है। तो फिर ये जूठे बेर आए कहां से?

बेर 'झूठे' करने का काम चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी प्रियादास ने किया। प्रियादास जी ने नाभादास रचित ‘भक्तमाल’ पर ‘भक्तिरसबोधिनी’ टीका लिखी जिसमे जूठे बेरों का वर्णन है।

तुलसीदास के समकालीन बलराम दास ने ओड़िया भाषा में दांडी रामायण लिखी है जिसमे राम लक्ष्मण को शबरी बेर के जगह 'सुंदरी आम' खाने को देती है। राम सिर्फ उन आमों को खाते है जिनपर दाँतों के निशान होते है। दाँतों के निशान शायद ये बताते है की वे आम शबरी द्वारा पहले चख कर देखे गए थे।

वाल्मीकि रामायण में शायद नीच जाती का उल्लेख नहीं है, पर तुलसीदस जी रामचरितमानस के अरण्यकांड ३५ /१, २, ३ में लिखते है :

पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।
केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।।
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।।

शबरी हाथ जोड़कर खड़ी हो गईं,  राम को देखकर उनका प्रेम अत्यंत बढ़ गया। शबरी राम से कहती है,"मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूं? मैं नीच जाति की और अत्यंत मूढ़बुद्धि हूं। जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूँ।"

तुलसीदास जी ने शबरी को नीच जाति का बताया, जिनके यहाँ जाकर राम ने बेर खाये। लोगो ने बेर जूठे बना दिए और नीच जाति की शबरी के जूठे बेर खाने वाली नयी कहानी बन गयी।

कंबन द्वारा 12वीं सदी में तमिल भाषा में रचित रामायण में न जूठे बेरो का ज़िक्र है, न किसी और फल का। तेलगु में लिखी श्री रंगनाथ रामायण में शबरी द्वारा राम को फल देने का वर्णन है पर ये नहीं बताया वह फल आम थे या बेर।

अध्यात्म-रामायण में जब शबरी राम की पूजा करती है और नीची जाती के होने के कारण अपनी अयोग्यता दर्शाती है, तब राम शबरी को बताते है जाती प्रधान नहीं है।

रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में एक चौपाई (३४/१) आती है:

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। 

तुलसीदास जी लिखते है, "शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील और गुण से हीन ब्राह्मण भी पूजनीय है और गुणगणों से युक्त और ज्ञान में निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है।"

गुणगणों से युक्त और ज्ञान में निपुण शूद्र पूजनीय नहीं है? वाह तुलसीदास जी वाह।  जब जब ये चौपाई पढता हूँ ऐसा लगता है जैसे कोई आँख में सुई चुभा रहा है।

निषादराज और शबरी निम्न जाति के बताये गए है, जिनसे राम को ख़ुद को पुजवाना तो स्वीकार्य था लेकिन किसी शूद्र को पूजना स्वीकार्य नहीं था। वाल्मीकि जी सबरी को सिद्ध तपस्विनी बताते है, पर राम उनके चरण नहीं छूते बल्कि वे राम के चरण छूती हैं। क्यों? ऐसे हज़ारों सवाल है जिनके जवाब शायद सिर्फ राम के पास होंगे।

आज नहीं तो कल मौत तो आनी है, मरने के बाद ही सही मुझे विश्वास है इन सवालों के जवाब राम से ज़रूर मिलेंगे :)

-K Himaanshu Shuklaa..

PS: I intentionally wrote 'झूठे' instead of जूठे  in the title and in the fifth para, because I feel the story about Shabari feeding the 'tasted’(जूठे ) berries to Ram is a LIE (झूठ ).

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2 comments:

  1. dil ko chu liya sir

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  2. जूठे से झूठे बनने की व्याख्या बहुत अच्छी लगी।

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