आज बैसाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है, पौराणिक ग्रंथों के अनुसार आज के दिन सीता की उत्पत्ति हुई थी।
आज कही पढ़ा
'धार्मिक मान्यता है कि इस दिन प्रभु श्रीराम और माता जानकी को विधि-विधान पूर्वक पूजा आराधना करने से व्रती को अमोघ फल की प्राप्ति होती है साथ ही व्रती को मनोवांछित फलों की भी प्राप्ति होती है'।
थोड़ा हास्यास्पद लगा, जन्मदिन सीता का और पूजा राम के साथ? बताये ज़रा क्या ऐसी कोई धार्मिक मान्यता है जो कहती हो राम नवमी के दिन राम-सीता की पूजा या फिर जन्माष्टमी के दिन कृष्णा के साथ राधा की आराधना करना चाहिए? खैर जाने दीजिये, पुरुष प्रधान समाज में ऐसा मुमकिन कहा?
कभी समय मिले तो वाल्मीकि रामायण पढ़ियेगा, पुरुष प्रधानता की अनेक मिसाल मिल जायेगी।
शायद इसीलिए वाल्मीकि जी ने सर्ग ६६(छियासठ) में सिर्फ दो श्लोको (१३-१४) में सीता की उत्पत्ति के बारे में संक्षेप में वर्णन किया है, हलाकि राम जन्म विस्तार में बताया गया है।